(Bombay High Court का 8 जुलाई 2025 का ऐतिहासिक फ़ैसला)
8 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने UNS Women Legal Association बनाम Bar Council of India & Others मामले में यह फैसला सुनाया कि POSH कानून — यानी कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 — महिला वकीलों द्वारा अन्य वकीलों पर लगाए गए उत्पीड़न के आरोपों पर लागू नहीं होता, भले ही यह कृत्य अदालत परिसर में ही क्यों न हुआ हो।
न्यायिक तर्क: POSH में “नियोक्ता-कर्मचारी संबंध” ज़रूरी
“Bar Councils वकीलों के नियोक्ता नहीं हैं। वे एक वैधानिक नियामक संस्था हैं। और वकील स्वतंत्र पेशेवर होते हैं, किसी कर्मचारी की तरह नियुक्त नहीं होते।”
इस कारण, वकीलों के बीच उत्पीड़न का मामला POSH कानून की परिधि में नहीं आता।
फिर क्या हैं महिला वकीलों के पास विकल्प?
1. अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई
अगर यौन उत्पीड़न को "पेशेवर कदाचार" माना जाए, तो पीड़िता राज्य बार काउंसिल में शिकायत दर्ज करा सकती है:
- फटकार (Reprimand)
- वकालत से निलंबन (Suspension)
- नाम हटाना (Removal from roll)
लेकिन यह प्रक्रिया POSH जैसी सुरक्षा नहीं देती —
- कोई आंतरिक शिकायत समिति (ICC) नहीं
- कोई कार्यस्थल सहायता या अंतरिम राहत नहीं
- कोई निश्चित समय सीमा नहीं
2. भारतीय दंड संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) के तहत आपराधिक मुकदमा
यदि कृत्य अपराध है, तो पीड़िता FIR दर्ज कर सकती है। प्रमुख धाराएं:
- धारा 74 – यौन उत्पीड़न
- धारा 75 – अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन संकेत या पोर्न दिखाना
- धारा 77 – मर्यादा भंग करने हेतु हमला
ये धाराएं जेल और जुर्माने जैसी सज़ा निर्धारित करती हैं।
सारांश में:
- Advocates Act = पेशेवर नैतिकता का उल्लंघन → अनुशासनात्मक कार्रवाई
- BNS 2023 = अपराध हुआ → आपराधिक कार्रवाई
दोनों रास्ते स्वतंत्र हैं और एक साथ अपनाए जा सकते हैं।
अब ज़रूरत है कानूनी सुधार की
POSH कानून कई स्वतंत्र पेशेवरों—जैसे वकील, डॉक्टर, फ्रीलांसर—को कवर नहीं करता। जरूरी है कि:
- “कार्यस्थल” की परिभाषा में अदालतें और वकालत का दायरा जोड़ा जाए
- बार काउंसिलों को ICC गठन के लिए बाध्य किया जाए
- व्यावसायिक लैंगिक संहिता (gender code of conduct) बनाई जाए
निष्कर्ष: जब कानून कुछ की रक्षा करे, लेकिन सभी की नहीं
महिला अधिवक्ताओं को वर्तमान में POSH जैसी संस्थागत सुरक्षा नहीं मिलती, जबकि वे खुद अन्य महिलाओं के लिए न्याय की लड़ाई लड़ती हैं।
अब न्यायपालिका ने आवाज़ उठाई है — अब बारी विधायिका की है।
विधिक संदर्भभी:
- मामला: UNS Women Legal Association बनाम Bar Council of India एवं अन्य
- न्यायालय: बॉम्बे हाईकोर्ट
- निर्णय दिनांक: 8 जुलाई 2025
- मुद्दा: क्या POSH अधिनियम वकीलों के बीच उत्पीड़न पर लागू होता है?
- फैसला: नहीं, क्योंकि नियोक्ता–कर्मचारी संबंध नहीं है।
आज के लिए बस इतना ही। मैं अगले सप्ताह एक और ऐसे फैसले के साथ लौटूंगी, जो न्यायिक दिशा को बदल सकता है!
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– अनुपमा
जागरूक रहें। सशक्त बनें।
लेखिका: अनुपमा सिंह | विधिक ब्लॉगर
The Legal Trifecta: IPR | Cyber Law | Property Law

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