केरल राज्य बनाम एन.एम. थॉमस [(1976) 2 SCC 310; AIR 1976 SC 490] का ऐतिहासिक निर्णय भारत में समानता और सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) की संवैधानिक समझ में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।
यह मामला अनुसूचित जातियों के लिए विभागीय परीक्षाओं और सेवा नियमों से संबंधित था, लेकिन इसकी गहराई इस बात में निहित थी कि न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर और न्यायमूर्ति फ़ज़्ल अली ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15(4), और 16(4) के तहत वास्तविक समानता की परिकल्पना को किस प्रकार नया अर्थ दिया।
भारत की सामाजिक न्याय की यात्रा में यह फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि यह सवाल उठाता है—क्या ऐतिहासिक असमानता से बने समाज में समानता का अर्थ सभी के साथ समान व्यवहार करना है?
न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर: समानता का अर्थ एकरूपता नहीं है
न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर की संवैधानिक व्याख्या न्यायिक सक्रियता का उत्कृष्ट उदाहरण रही। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि:
"समानता हमेशा समान व्यवहार नहीं होती।"
(“Equality is not always identity of treatment.”)
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 14 की व्याख्या किसी तकनीकी औपचारिकता की तरह नहीं की जानी चाहिए।
"समानता की गारंटी का अर्थ समान व्यवहार की गारंटी नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए समान कानून की गारंटी है जो समान स्थिति में हैं।"
(“The guarantee of equality is not a guarantee of identical treatment; it is a guarantee of equal laws for people who are equally situated.”)
रूपात्मक नहीं, रूपांतरकारी समानता
अर्थात — समानता का मतलब केवल सतही या ऊपरी समानता नहीं है, बल्कि असली और असरदार बराबरी है।
यह विचार कहता है कि सभी को एक जैसा देखने की बजाय, हमें यह समझना होगा कि कौन पीछे रह गया है और उसे ज़रूरत के मुताबिक़ मदद देकर बराबरी तक पहुँचाना ही असली न्याय है।
न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के अनुसार, समानता का अर्थ सिर्फ सभी से एक जैसे व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें उन लोगों के लिए विशेष उपाय शामिल हैं जो ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं।
"समानता की सच्ची भावना तभी पूरी होती है जब जो लोग सामाजिक या आर्थिक रूप से पिछड़ चुके हैं, उन्हें ज़रूरत के अनुसार सहारा देकर आगे लाया जाए।"
"कभी-कभी समानता के लिए भिन्न व्यवहार आवश्यक होता है ताकि वंचित वर्गों को ऊपर उठाया जा सके।"
(“Equality is not always about identical treatment; sometimes, it demands differentiation to uplift the disadvantaged.”)
वह कहते हैं कि:
"कानून आकाश में तैरती कोई अमूर्त सत्ता नहीं, बल्कि समाज की सच्चाइयों में जड़ें जमाए जनता की मुखर आवाज़ है।"
(“Law is not a brooding omnipresence in the sky but the articulate voice of the people rooted in social reality.”)
न्यायमूर्ति फ़ज़्ल अली: संवैधानिक करुणा के रूप में सकारात्मक कार्रवाई
न्यायमूर्ति फ़ज़्ल अली ने अपने पृथक लेकिन सहमतिपूर्ण मत में कहा:
"जहाँ आवश्यक हो, असमानों के साथ असमान व्यवहार करना ही न्याय है ताकि सभी को समान अवसर मिल सके।"
(“Justice means treating unequals unequally when required, to bring them to a level playing field.”)
सकारात्मक भेदभाव की पुष्टि
- अनुच्छेद 14 के तहत उचित वर्गीकरण न्यायसंगत है।
- आरक्षण और रियायतें असमानता मिटाने का संवैधानिक उपाय हैं।
- अनुच्छेद 16(4) अपवाद नहीं, बल्कि 16(1) का ही विस्तार है।
"संविधान यांत्रिक समानता की अपेक्षा नहीं करता। वह गंभीर सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए भिन्न व्यवहार की अनुमति ही नहीं देता, बल्कि उसकी माँग करता है।"
(“The Constitution does not command mechanical equality. It permits—and even demands—differential treatment to remedy deep-seated disadvantage.”)
विरासत और प्रासंगिकता
इस फैसले ने निम्नलिखित ऐतिहासिक निर्णयों को प्रभावित किया:
- इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992): आरक्षण और ओबीसी उपवर्गीकरण की अनुमति।
- अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ (2008): उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण की पुष्टि।
- जर्नैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता (2018): क्रीमी लेयर को पदोन्नति से बाहर करना वैध।
न्यायमूर्ति अय्यर और फ़ज़्ल अली द्वारा प्रस्तुत विचार आज भी भारतीय न्यायशास्त्र में “संरक्षणात्मक भेदभाव” की आधारशिला बने हुए हैं।
निष्कर्ष
*एन.एम. थॉमस* निर्णय में, दोनों न्यायाधीशों ने औपचारिक समानता की संकीर्ण अवधारणा से हटकर सामाजिक न्याय पर आधारित रूपांतरकारी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
वे यह संदेश देते हैं कि—
जब समाज में असमानता गहराई तक हो, तब न्याय के लिए समान नहीं, बल्कि असमान उपाय अपनाने पड़ते हैं।
आज के लिए बस इतना ही। मैं अगले सप्ताह एक और ऐसे फैसले के साथ लौटूंगी, जो न्यायिक दिशा को बदल सकता है!
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– अनुपमा
जागरूक रहें। सशक्त बनें।
लेखिका: अनुपमा सिंह | विधिक ब्लॉगर

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