Monday, 28 July 2025

किशोरों की सहमति और POCSO अधिनियम: एक संवेदनशील कानूनी द्वंद्व!

सहमति की उम्र 18 वर्ष ही रहनी चाहिए: केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा

सहमति की उम्र 18 वर्ष ही रहनी चाहिए; किशोर संबंधों के मामलों में न्यायिक विवेक संभव: केंद्र सरकार




पृष्ठभूमि:

सुप्रीम कोर्ट में यौन अपराधों के मामलों में भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की प्रतिक्रिया में सुधार के संबंध में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका के संदर्भ में केंद्र सरकार ने अपनी लिखित दलील (Written Submission) में कहा है कि:

"भारतीय कानून के तहत सहमति की वैधानिक आयु 18 वर्ष से कम करने के किसी भी कदम का हम विरोध करते हैं।"
यूनियन ऑफ इंडिया की सुप्रीम कोर्ट में दलील

केंद्र का रुख:


केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि:

  • सहमति की वैधानिक आयु (Age of Consent) 18 वर्ष ही रहनी चाहिए।
  • इसे घटाकर 16 या किसी और उम्र में बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

हालांकि सरकार ने यह भी माना कि:

  • किशोरों के आपसी सहमति पर आधारित संबंधों के मामलों में अदालतों को न्यायिक विवेक का उपयोग करने की सीमित स्वतंत्रता होनी चाहिए।


मामला क्यों उठा?


POCSO अधिनियम के तहत सहमति का कोई महत्व नहीं

POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) अधिनियम, 2012 के तहत, 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के साथ यौन संबंध, चाहे वह आपसी सहमति से ही क्यों न हो, कानूनन अपराध माना जाता है।


विधिक उप-संदर्भ: POCSO अधिनियम की प्रासंगिक धाराएँ

यह कानूनी स्थिति विशेष रूप से POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 2(d) और धारा 3 से 10 तक की धाराओं पर आधारित है:

  • Section 2(d) – “Child” की परिभाषा: “Child” means any person below the age of eighteen years.
  • Section 3: Penetrative Sexual Assault
  • Section 4: Punishment for Penetrative Sexual Assault
  • Section 5: Aggravated Penetrative Sexual Assault
  • Section 7: Sexual Assault (Non-penetrative)
  • Section 8: Punishment for Sexual Assault
  • Section 9–10: Aggravated Sexual Assault and its punishment

इन धाराओं के अंतर्गत, यदि पीड़ित की उम्र 18 वर्ष से कम है, तो सहमति को कोई कानूनी मान्यता नहीं दी जाती। अतः कोई भी यौन गतिविधि — चाहे वह आपसी सहमति से क्यों न हुई हो स्वतः अपराध की श्रेणी में आती है


कठोर सुरक्षा और इसका प्रभाव

इस अधिनियम का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से पूर्ण और सख्त सुरक्षा प्रदान करना है। हालांकि, इसके कठोर प्रावधानों के कारण कई बार ऐसे किशोर प्रेम संबंध, जो पूरी तरह आपसी सहमति पर आधारित होते हैं, उन्हें भी बलात्कार या यौन अपराध की श्रेणी में दर्ज किया जाता है।

किशोरों के जीवन पर गंभीर प्रभाव

ऐसे मामलों में न केवल आरोपी किशोर, बल्कि कथित पीड़ित किशोर भी कानूनी और सामाजिक कलंक झेलते हैं। इससे उनके शैक्षिक, मानसिक और व्यक्तिगत भविष्य पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।

न्यायिक चिंता और विवेक का महत्व

कई उच्च न्यायालयों ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने महसूस किया है कि ऐसे मामलों में POCSO अधिनियम की कठोरता न्याय के मूल सिद्धांतों के साथ समझौता कर सकती है। अतः आवश्यकता है कि न्यायालयों को इन मामलों में न्यायिक विवेक के प्रयोग की छूट दी जाए ताकि वास्तविक न्याय सुनिश्चित हो सके।


सुप्रीम कोर्ट की भूमिका:

अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा:

  • क्या किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को 'अपराध' की श्रेणी से बाहर रखा जा सकता है?
  • क्या किशोरों के परिपक्व निर्णय लेने की क्षमता को कुछ हद तक मान्यता दी जानी चाहिए?
  • क्या ऐसे मामलों में अभियोजन से छूट, सज़ा में नरमी या बिना सज़ा के चेतावनी जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं?
  • क्या POCSO अधिनियम में कोई "Romantic Exception" जोड़ा जा सकता है?
  • क्या अभियोजन या सज़ा से छूट देने के लिए न्यायिक विवेक का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है?

निष्कर्ष:

केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट है — सहमति की आयु 18 वर्ष बनी रहे ताकि बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा मिले। लेकिन किशोर संबंधों में कठोर कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए अदालतों को विवेक का प्रयोग करने की अनुमति होनी चाहिए। यह संतुलन संरक्षण और न्याय, दोनों को साथ लेकर चलने का प्रयास है।


लेखिका: अनुपमा सिंह | विधिक ब्लॉगर
The Legal Trifecta: IPR | Cyber Law | Property Law

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